मंगलकारी टिप्पणी चर्चा : चच्चा टिप्पूसिंह की कलम से

10/06/2009 Leave a Comment

इस मंगलवारी टिप्पणी चर्चा में आपको टिप्पू चच्चा की टिप टिप पहुंचे! और हार्दिक स्वागत भी करवा लिजिये। चच्चा के कौन से नोट खर्च हो रहे हैं स्वागत करने मे? आप पूछें उससे पहले ही बता देते हैं कि आज मगरुर बच्चे ने टेंपलेटवा नाही बदला सो भैया बिना काम के बोर हो रहे थे । सो अजय झा जी की कल की शानदार टिप्पणी चर्चा पोस्ट पर यह चर्चा चढ़ाकर इस टिप्पणी चर्चा को आगे बढा रहे हैं। वैसे मगरुरवा से पिडीत होने वाले हम अकेले नहीं हैं । यकीन मानो कि पूरा ब्लॉग जगत मा अनेको लोग उसका सताया हुआ है । दक्षिण-भारत बाढ़ से परेशान है, बहुत जन धन हानि होगया और हिन्दी ब्लॉग जगत मगरुरों से पीडित है।

चच्चा का गांधीवादी विरोध यानि मगरुर-सत्याग्रह क्षमा याचना तक जारी रहेगा। सहयोग देने के लिये आप सबका चच्चा टिप्पूसिंह शुक्रिया अदा करता है। आईये अब आपको कुछ शानदार टिप्पणीयों से रुबरु करवाते हैं।

आज मिष्‍टी बिटिया का जन्‍मदिन है शुभकामनाएं, गौतम ने पोस्‍ट लगाकर चिंतित लोगों को राहत दी, तरही मुशायरे के लिये ग़ज़लें भेजने में जल्‍दी करें दीवाली पास है ।

Udan Tashtari ने कहा…
मिष्टी को जन्म दिन की बहुत बहुत बधाई, एक ट्रक टॉफी, एक उड़नतश्तरी भर के केक....खूब सारा आशीष...और अब, समीर अंकल को थोड़ी सी तो मिठाई खिलाओ....




याद कर रहा हूँ तुम्हें, सँजो कर अपना एकान्त ...

ARVIND MISHRA SAYS:
OCTOBER 6, 2009 9:15 AM
अद्भुत हिमांशु ! एको रसो करुनेव गलत लग रहा है -होना चाहिए एको रसो प्रेम एव ! जीवन का श्रृगार ही प्रबल पक्ष है क्यों ? संयोग वियोग को दोनों को समेटे !



क्या अन्तर पड़ेगा यदि हम किसी ब्लौगर मित्र का चेहरा, नाम, पता, उम्र जानें या न जानें ?

वाणी गीत ने कहा…
बहुत मर्यादित शब्दों में बहुत सार्थक तर्कों के साथ आपने लगभग सभी महिला ब्लोगर्स की ओर से जवाब दे दिया है ...बहुत से लेखक अपनी पहचान छुपाते हुए छद्म नाम से लिखते रहे हैं ...अगर महिलाएं ऐसा करती हैं तो क्या परेशानी है ...और फिर ये भी हो सकता है की छद्म नाम हो ही ना ...कई लोग कई नामों से भी तो पुकारे जा सकते हैं ...जहाँ तक साहसिक होने की बात है ... ज्यादा से ज्यादा पुरुष मित्र बनाना आदि ही यदि साहसिक लेखन का मापदंड है तो ....घूघट वाली या बिना घूँघट वाली महिलाएं ऐसी साहसिकता से परहेज रखना चाहती हैं तो अच्छा ही है ...!!

4:42 पूर्वाह्न


इसी पोस्ट पर एक और टिप्पणी पढिये!

प्रवीण त्रिवेदी...प्राइमरी का मास्टर ने कहा…
वैसे मैं किसी रूप में भी नकली चेहरों का घोर विरोधी हूँ .......चाहे वह पुरुष हो या महिला !

वैसे सब जानकारियां सार्वजनिक करने के बाद भी वह वास्तविक हों इसकी कोई गारंटी है?

बाकी अगर यह असलीइ पंडित
हैं तो मुद्दे की बात पर हमारी राय भी उनके साथ !!..... मतलब उद्देश्य क्या है ?



गणित शिक्षा प्रत्येक विद्यार्थी के दिमाग को आकर्षित करने के लिए क्या कर सकती है?

7:06 पूर्वाह्न


गणित शिक्षा प्रत्येक विद्यार्थी के दिमाग को आकर्षित करने के लिए क्या कर सकती है?


ताऊ रामपुरिया said...
प्राथमिक स्कूल में सिखाए जाने वाले गणित के अधिकतर कौशल उपयोगी होते हैं। बहरहाल, पूर्ण वर्णित `उच्चतर लक्ष्यों´ की प्राप्ति के लिए पाठ्यक्रम के पुनरुपयोग से बच्चे उस समय का बेहतर उपयोग कर सकेंगे जो वे स्कूल में व्यतीत करते हैं ।

बहुत उत्तम बात कही.

रामराम.

6 October, 2009 9:25:00 AM IST


सुनकर वे चकरा जायेंगे


कुश Says:
Posted on October 06, 2009 9:22 AM
आप तो पुरे सप्ताह पर कब्जा कर ही लीजिये.. इसी बहाने दो शब्दों वाली टिप्पणिया एक लाईन में तो आने लगेगी.. झक्कास चर्चा
ई त पैदायशी विनम्र मगरुर बचुआ प्रकट भया का?


तलाश है एक अदद एंग्री यंगमैन की..


बी एस पाबला said...
बाज़ारवाद के इस युग में एक एंग्रीमैन आएगा और सबसे मंहगा मोबाईल, घड़ी, घर और कार लेकर ही दम लेगा।

बी एस पाबला
October 6, 2009 6:15 AM


काफ़ी विद मी…

चाहता हू एक दिन
अपने साथ बैठू,
एक काफ़ी हो और
हम दोनो ढेर सारी बाते करे,
हसे, खिलखिलाये ….
एक दूसरे को और जाने…

मै उससे पूछू कि वो
इतना गम्भीर क्यू है?
और बताऊ कि क्या
मजबूरिया है मेरी,
जो मै उससे मिल नही पाता….
अवश्य पढें...

तुम, मैं...और हमारी असल सूरतें


Vivek Rastogi said...
वाह आपने तो वह सपना ही लिख दिया जो मैं हमेशा देखता रहता हूँ।

05 October 2009 22:24


राम औ रहीम हो गए इस जहाँ से फरार

वाणी गीत said...
गीता, कुरान, बाइबल तो पढाये पाठ प्यार
बहरों की बड़ी भीड़ है और चीखना बेकार
राम औ रहीम हो गए इस जहाँ से फरार
लड़ते रहेंगे हम तो बस ख़ुदा है कुसूरवार

हाँ चीखना फिलहाल तो बेकार है ...फिर भी चीखते रहिये ...कभी कानों का मैल ख़त्म हुआ तो बात तो पहुँच ही जायेगी और भेजे में उतर जायेगी ...
October 5, 2009 4:56 PM


चच्चा टिप्पू सिंह की जय हो !!


Udan Tashtari on October 6, 2009 6:51 AM
चच्चा टिप्पू सिंग अपनी जगह सही हैं, सब समझ रहे हैं.


वाह पंकज मिश्रा साहब ! अजय झा जी के बाद एक और शेर आप निकले जो चच्चा के समर्थन मे खुल कर आये। हमका बडी खुशी है कि आज भी सच का साथ देने वाले लोग मौजूद हैं। हम आपको जल्दी ही अपना साथ लूंगा...आपका समर्थन का लिये आपको धन्यवाद देता हूं।

शुभम आर्य ने हासिल किया द्वितिय महाताऊश्री सम्मान


शुभम आर्य
October 5, 2009 9:46 PM

आप सभी का बहुत बहुत धन्यवाद ..........

पहली बात तो महाताऊ बनकर बहुत अच्छा लग रहा है शायद कुछ लेट हो गया बनने में ..........और इस बीच कुछ अंतराल के लिए ब्लॉग्गिंग की दुनिया से बाहर भी रहा ....और पहेलियों में भी भाग नहीं ले पाया ...... :(

@ ताऊ जी
ये पहली प्रतियोगिता इतनी सफलता से इतना लम्बा वक़्त पूरा कर लेंगी ...सोचा न था ... अभी कल ही की बात है जैसे पहली पहेली पूछी गई ......आपकी पहेली दिन प्रति दिन सफलता के नए मानक तय कर रही है और ब्लॉग जगत को समृद्ध बना रही है ...अब इसके जल्दी ही गोल्डन जुबली पहेली का इंतजार है .........

@ अल्पना वर्मा जी
आपके प्रोत्साहन का विशेष धन्यवाद
......आपने हमेशा से मेरा हौसला बढाया है और आशा करता हूँ हमेशा बढाती रहेंगी .....

हॉस्टल में पार्टी की तो अलग बात है पर हाँ अब सभी उम्र और ताई के बारे में पूछ कर चिढा जरूर रहे हैं .....
कह रहे है कुछ जल्दी ही ताऊ बन गए और ताई कहाँ है ? कभी उनसे भी मिलवाओ ..... :)

भगवान् बचाए .इनसे ...

अब अगले महाताऊ का इंतजार है मेरी तरफ से उसे अग्रिम बधाइयाँ ....

:) :) :) :)


घूमे आधी रात को चिडियाघर में!


Arvind Mishra said...
किसी भी चिडियाघर के सैर का यह एक अलग सा अनुभव -मगर चित्रों में रात का खौफ दिखता है ! फैल्कन शो के बारें में एक पृथक पोस्ट कर पाएगीं ?
वैसे यह पशुओं की जैवीय घड़ियों को निश्चित ही कुछ व्यतिक्रम करता होगा !
पशु व्यवहार विज्ञानियों के लिए यह किसी प्रयोगशाला से कम नहीं है -जहां जैवीय घड़ियों के व्यतिक्रम का ध्ययान हो सकता है .
यह एक रोचक उदाहारण भी है की कैसे मानव कुदरत को बदलने का उपक्रम करता रहता है !

OCTOBER 5, 2009 3:17 PM


तुम कौन सी शाख के मोर हो जी


dr anurag
October 5, 2009 at 12:07 pm Permalink
कुदरत से छेड़छाड़ .प्रकति का अपने मतलब के लिए दोहन …अगली प्रलय का जिम्मेवार आदमी ही है जी…खैर जाने दीजिये .आप कहेगे हम हर जगह सीरियस हो जाते है …..
हमारे यहां भी कई मरीजो की उम्र तीस से पैतीस से बीच कित्ते सालो से अटकी पड़ी है …कभी कभार कोई उसे धकेलने की कोशिश करता है तो धमका दिया जाता है ….खैर आज की पोस्ट की बाबत कई सवाल है दिमाग में …मसलन ….बशीर बद्र की जो टांग आपने तोडी है जी…मसलन नीचे जो फोटू देकर आप परिचय छापे है …मसलन इधर बाए हाथ में दो तें विज्ञापन जो है..


तुम्हारे लिए

Mahfooz said,
October 5, 2009 at 7:55 am

कीमती तोहफे नही ला पाई कभी
क्यूंकी किम्मत से दिल नही खरीदे जाते
मुरादें गर वक़्त पर पूरी ना हो
दरमियाँ के फ़ासाले फिर भर नही पाते
एक गुलाब देने की हैसियत रखती हूँ
महक जिसकी सिर्फ़ तुम्हारे लिए
जो यादों में बस कर सदा पास रहती है

OMG!!!!!!!!! kya likha hai aapne…..महक जिसकी सिर्फ़ तुम्हारे लिए
जो यादों में बस कर सदा पास रहती है waah!!!!!!!

bahut hi dil se likha hai aapne isey…….


अत: मैंने आज यह नया चोगा पहन ही लिया

'अदा' ने कहा…
लो कर लो बात...
हम आये दौडे-दौडे की पता नहीं आप बंगाली बाघ से कहीं अफ्रीकन हाथी तो नहीं बन गए चोगा बदल कर ...
अरे बाबा कह तो दिए थे बहुत सुन्दर...एतना की अब हमरा मन भी डोल रहा है टेप्लेत्वा चोराने का ....लेकिन ब्लाग जगत का हवा ठीक नहीं है कह के रुक गए....हा नहीं तो.....बात करते हैं.......

October 5, 2009 4:04 PM


अरे टाईगर जी ई त पुराना यानि फ़ैशन से बाहर हो गया...आज वाला यानि नया वाला लगाईये तनि...ना मिले त रोहित बचवा बता देगा...सभी को बोलिये ना कि सब रोज रोज टेंपलेटवा बदले...केतना अच्छा लगता है ई रोज टेंपलेट बदल बदल के लिखना?

अब चच्चा टिप्पू सिंह इस चर्चा को यहीं विराम देने की आज्ञा चाहेगा. आपको कैसा लगा यह प्रयास? और अब आखिर में....

टिपते टिपते...


अरे ओ ठेकेदारो !
बात किसी की ना मानो यारो
व्यर्थ विवादों में उलझावो सीधे साधे लोगों को
निजी मामलों को भले मत सुलझावो
पर दुसरे के फ़टे में जरुर पांव अडावो
तुम्हारी इज्जत बढे ना बढे
पर दूसरों की इज्जत के चिथडे जरुर उडावो
अरे ओ ठेकेदारो !
भाग गए जो आग लगाकर
मांगो जवाब उन्हें बुलाकर
क्या उनका मंतव्य यही था ?
अथवा उनके मन में द्वेष कहीं था ?
पूछे जाने पर शर्मायेंगे?
पैदायशी विनम्र की नकाब चढायेंगे?
चच्चा की इज्जत नही है खरबूजा
जवाब मिलेगा कडक दूजा

7 comments »

  • Pankaj Mishra said:  

    टिप्पू चच्चा की जय हो !!चच्चा धन्यवाद  बच्चे के ऊपर ध्यान देने के लिए . मै तो खुलकर सामने आया क्युकी मै भी आपकी तरह ही किसी के दवाब में रहकर ब्लागिंग नहीं करना चाहता मैंने अपने प्रोफाइल में लिखा है
    साँस लेते हुए भी डरता हूँ!
    ये न समझें कि आह करता हूँ!

    बहर-ए-हस्ती में हूँ मिसाल-ए-हुबाब!
    मिट ही जाता हूँ जब उभरता हूँ!

    इतनी आज़ादी भी ग़नीमत है!
    साँस लेता हूँ बात करता हूँ!

    शेख़ साहब खुदा से डरते हो!
    मैं तो अंग्रेज़ों ही से डरता हूँ!

    आप क्या पूछते हैं मेरा मिज़ाज!
    शुक्र अल्लाह का है मरता हूँ!

    ये बड़ा ऐब मुझ में है 'yaro'!
    दिल में जो आए कह गुज़रता हूँ!

  • Arvind Mishra said:  

    चचा इस वाद को खत्म करने का क्या लेगें ?कोई बलि चाहिए तो बताईये !

  • Manorama said:  

    चचा जी आपने देखा नहीं का इ देखो अब तो इ मगरूर लोग आप को मेढक बना रहे है . अब आगे आप समझो

  • हिमांशु । Himanshu said:  

    चलिये कह सकेंगे कि हम बच्चा लोग चच्चा की स्वाभिमान की लड़ाई के साक्षी रह चुके हैं !

    बेहतर टिप्पणी चर्चा । आभार ।

  • वाणी गीत said:  

    ई टिपण्णी चर्चा तो बहुते मजेदार रहा ...तनिक देर से नजर पड़ा ...हमरा टिपियाया सामिल किये हैं ...का बोलें ..बहुते आभार ...!!

  • दर्पण साह "दर्शन" said:  

    ek rahe ...
    ir ek rhein bir, ek rahei fatee, ek rahe hum.....

    eir kahe hum tipyaiye aiye,
    bir kahe hum tipyaiye aiye,
    fatee kahe hum tipyaiye aiye,
    hum kahe hamahu tipyie aaiye...
    er dinhi ek comment,
    beer dinhi ek comment,
    fatee dinhi teen comment....
    hamar?
    likhte likhte post ban gawa !!

  • Pankaj Upadhyay said:  

    idhar pahli baar aaya hoon..aur glani hai ki pahle kyun nahi aaya..kya idea hai..tippanee charcha..waise bhi kam milti hai aur aapke charcha mein khinachai na ho to log aur kam kar denge :P

    Dhanyawaad aur aabhaar aapka..apne is pratishthit manch par humara naam lene ke liye :) phir milte hain..

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