दुनिया की हर भाषा के किसी भी चिट्ठाकार के लिये इस चिट्ठे के दरवाजे खुले हैं जो दूसरे की इज्जत करना जानते हैं. इस चिठ्ठे पर दूसरों की इज्जत खराब करने और गाली देने वाले चर्चाकारों को कतई इजाजत नही होगी, जैसी की दूसरी जगह कुछ चर्चाकार यही करते हैं.

यहां चिट्ठों और उन पर की गई टिप्पणीयों की चर्चा हिंदी में देवनागरी लिपि में होगी. यहां सिर्फ़ साफ़ सुथरे चिठ्ठों और उनकी टिप्पणियों पर ही चर्चा होगी. किसी पर छींटे उछालने वालों को यहां शामिल नही किया जा सकेगा. चाहे आपने उसे आज लिखा हो या साल भर पहले हम उपयुक्त होने और समय पर उस की चर्चा अवश्य करेंगे.

सामाजिक नजरिये से नकारात्मक ब्लाग की चर्चा हम नही करेंगे. यह हमारा उसूल है कि ना किसी की इज्जत से खेलो और ना अपनी इज्जत से किसी को खेलने दो. यह काम सामूहिक रूप से करने मे अगर आप सहयोग देना चाहते हैं तो हमसे संपर्क किजिये. आपका यहां हम खुले दिल से स्वागत करते हैं.

आप दूसरा विवाह अतिशीघ्र किजिये : चच्चा टिप्पू सिंह

[ 8/09/2010 | 13 comments ]

हां तो बच्चा लोग सबसे पहले तो चच्चा टिप्पूसिंह की टिप टिप पकडो. हम इंहा से आखिरी पोस्ट अठ्ठाईस जनवरी दू हजार दस को लिखा रहा. फ़िर अब आजादी का जश्न मनाने हर साल की तरह वतन लौटा हूं. आप में कई लोगन का मेल हमका लगातार मिलता रहा. ऊही सबसे मालूम पडता रहा कि ई ब्लाग नदिया से काफ़ी सारा पानी बह चुका है.

ब्लागवाणी जैसा सेवाभावी एग्रीगेटर बंद हुई गवा. अनेकों ब्लागर ठंडे हुई गये. या मौज से परेशान हूई कर ब्लागिंग छोड गये अऊर आप सब लोग ई जानत हो कि ई सबका पीछे ऊई लोग हैं जो उनका चर्चा पर हमारा मजाक ऊडाये रहे अऊर आज तक ऊ टिप्पणी नाही हटाया. अब हम वापस वतन आगया हूं त हमरा विरोध चालू रहेगा....

हम आज का टिप्पणी चर्चा हमरा पिछला पोस्ट चिठ्ठाचर्चा डोमेन डकैतों द्वारा लूटा गया? : चच्चा टिप्पू सिंह पर आया एक ठो टिप्पणी से करूंगा


डा० अमर कुमार said:

चर्चा चटखारेदार बन पड़ी है...
लेकिन मिर्ची कुछ ज़्यादा हो गयी,
अब तक जलन हो रही है, चच्चा कोनो मलहम बताओ !


अजी डागदर साहिब...हम का मलहम बतायें? डागदर जी आप हो त दवा भी आपे बताईये....हमरा त जब तक बदला बाकी रहेगा बिल्कुल पटनिया मिर्च ई लोगों को ऊपर नीचे से खिलाता रहूंगा...अब आगे कछु टिप्पणी देखा जाये...

उडनतश्तरी का "वो रिश्ते.." पर

 डॉ टी एस दराल ने कहा…

आजकल ऐसे भी रिश्ते होते है जो भूख के खौफ से नहीं , शौक से बनते हैं ।
अब उनकी क्या मजबूरी और कैसी संवेदना ।
वैसे कालों से चलते आए इस नाकाम काम को अंजाम देने वाले भी तो हम ही है । सफेदपोश !

8/09/2010 07:48:00

वह वाह डागदर दराल साहिब का बात कही है? हम तो आते ही आपका फ़ैन हुई गवा. बहुत जोरदार बात कही आपने. 

इसका बाद "चमचा साधै सब सधै--एक व्यंग्य----ललित शर्मा" पर

  Ratan Singh Shekhawat ने कहा…

भारतीय संस्कृति में भोजन बिना चमचे के ही किया जाता है, हाथ से खाने में थाली से भोजन सीधा मुंह में जाता है। अगर अंधेरा भी हो जाए तो आंख मुंद कर भी खाएं तो हाथ सीधा मुंह में ही जाता है। जो कि चमचे से संभव नहीं है।
@ भाई जी
आप एक बात भूल गए बेशक हमारी संस्कृति में भोजन बिना चमचे के किया जाता था पर बिना चमचे भोजन बनाना भी तो असंभव है और भारत में भोजन बनाते समय चमचे के साथ साथ चाटू का भी प्रयोग किया जाता था अब भी गांवों में चाटू प्रयोग किया जाता है राबड़ी,खिचड़ा आदि बनाने के लिए |
और चाटुकारिता का नाम भी आप जानते ही है इसलिए ये चाटुकार व चमचे हर संस्कृति व सदी में मौजूद रहे है |
बहरहाल आपका ये व्यंग्य पड़कर मजा आ गया :)
लेख की प्रशंसा को चमचा गिरी मत समझिएगा :) )

९ अगस्त २०१० ७:०२ AM

इसी चमचागिरी का कमाल है….चमचे ही बोलेंगे अब…."हरेक इंसान के अंदर होता है एक चैंपियन ........अजय कुमार झा" पर

 बी एस पाबला ने कहा…

बिल्कुल सही है जी। होता है हरेक के अंदर चैंपियन। कभी कभी तो डेडली कॉम्बो भी हो जाता है :-)
रोचक अभिव्यक्ति, प्रेरक प्रसंग, सारगर्भित विचार

८ अगस्त २०१० १०:४९ PM

अनवरत पर "पुलिस का चरित्र क्यों नहीं बदलता?" में

 ललित शर्मा said...

आजादी के पहले सत्ता-सेठ-मठ के गठजोड़ से जनता का खून चुसा जाता था। आजादी के बाद भी ये गठबंधन कायम है। नेता,सेठ और मठ तीनों के गठजोड़ से ही सत्ता कायम है और जनता का खून चूसने में लगे हैं।
आजादी मिली है लूट पाट और दबंगई, भ्रष्टाचार करने के लिए।
आजादी के सही मायनों की तलाश अभी भी है कि हमने आजादी क्यों हासिल की थी?
क्या यही सब देखने के लिए।

9 August 2010 1:24 AM

इसका बाद मा "सड़क मार्ग से महाराष्ट्र: यात्रा के पहले की तैयारी, नोकिया पुराण और 'उसका' दौड़ कर सड़क पार कर जाना" पर

 खुशदीप सहगल said...

नोकिया को शुरू में ही नो क्यों नहीं किया...
इतनी तैयारी तो अपोलो मिशन ने भी चांद पर जाने से पहले नहीं की होगी...
वैसे रस्से पर बात याद आई...
सड़क पर खराब हो गए एक ट्रक को दूसरा ट्रक रस्से से खींच कर ले जा रहे थे...मक्खन की नज़र पड़ गई...ढक्कन से बोला...देख इनका दिमाग़ खराब...एक रस्से को खींचने के लिए दो-दो ट्रक लगा रखे हैं...
मज़ेदार रहा ट्रेलर...पूरे वृतांत की पिक्चर वाकई टॉपम-टॉप होगी...
डेज़ी की याद दिलाकर फिर भावुक कर दिया...
जय हिंद...

August 09, 2010 2:17 PM

आगे देखा जाये… "A confession - बस ये जानना और बाकी था...."  पर…

 Udan Tashtari ने कहा…

इतने बड़े बड़े जोधा लगे हैं कि स्टोरी तो खैर कम्पलीट हो ही जायेगी..हम तो बस इत्ता चाहते हैं कि गाना लिखने का काम हमें दे देना...ढिन्चाक लिख कर देंगे स्क्रिप्ट के हिसाब से...फ्लैश बैक( वो १७-१८ साल पहले की घटना) भी गाने में ही ले जायेगे. :)
बेचारा फत्तु..गांव से इत्ती दूर आकर भी पहचाना गया.

Monday, August 09, 2010 5:53:00 PM

इस ढिन्चाक…ढिन्चाक …टिप्पणी का बाद मा…. "मक्खन और मुथैया मुत्थुस्वामी...खुशदीप" पर

 

 राज भाटिय़ा said...

हे राम.... जो जो सज्जन रात की डयूटी करते है उन के लिये यह चुटकला नही है... यह भी लिख दे:)

August 9, 2010 1:41 AM

अऊर बच्चा लोग सबका आखिरी मा एक बहुते खतरनाक पोस्ट "मैं फिर से विवाह करना चाहता हूँ....महानता पाने की ओर अग्रसर होना चाहता हूँ.....देश और दुनिया को बदल देना चाहता हूँ.....सतीश पंचम" ……ई सब हम नाही कह रहा हूं…ई खुदे सतीश पंचम कह रहे हैं….अऊर सबको बिगाडने का ठेकादार ताऊ ऊंहा क्या शिक्षा दे रहा है? जरा देखा जाये…

 

 ताऊ रामपुरिया said...

चिंता की कोई बात नही है. आप दूसरा विवाह अतिशीघ्र किजिये और कोई आये या ना आये, हम जरूर आऊंगा.
अब पते की बात...दूसरी शादी तो कोई भी ऐरा गैरा कर सकता है. आप हमारी बात मान के चलेंगे तो हम आपकी तिसरी तो क्या चौथी भी करवा के रहूंगा.
कोई शक?
रामराम.

August 09, 2010

तो बचुआ लोग…हमको ई ताऊ कोनू बहुते खतरनाक प्राणी लग रहा है….अऊर केतना गलत सलाह देरहा है? पंचम बचुआ ताऊ की बात मानोगे त तुम्हरा खैर नाही… ई ताऊ त तुमको जन्माष्टमी का पहले ही कृष्ण जन्मस्थली पहुंचाये का इंतजाम करता दिख रहा है.

अगर मानना ही है तो ई नीचे वाली सलाह मानो अऊर मजा मा रहो….

 

 डॉ.कविता वाचक्नवी Dr.Kavita Vachaknavee said... ी

आपकी तथाकथित महानता की आस कहीं स्त्रीमुक्ति अभियान में न रूपांतरित हो जाए, बंधु ! इसलिए श्रीमती जी की महानता की कामना का भी ओर छोर ज़रा पता कर लें.

August 09, 2010

तो बचूआ लोग अब चच्चा टिप्पू सिंह की टिप टिप….फ़िर जल्द ही मिलूंगा….हमसे कोई संपर्क करना चाहे त हमका ई मेल करो…हम आपका सब मेल गुप्त रखूंगा….

चिठ्ठाचर्चा डोमेन डकैतों द्वारा लूटा गया? : चच्चा टिप्पू सिंह

[ 1/28/2010 | 24 comments ]

चच्चा को tippukidak@gmail.com पर मेल कर सकते हैं!

हां त बच्चा लोग…हम आगया हुं. अबहीं हमरे लौटने का कोनू विचार नाही था पर का करें? बहुते लोग हमको इमेल करके लिखे रहे कि चच्चा जबसे आप गये हो इहां का माहोल बहुते जियादा  बिगड गया है।   तो का करुं?   हम आपको टिप टिप करने और हाल चाल लेने चला आया हूं।

 

हम आते ही खुशदीप का ब्लागवा देखा रहा…उहां त उही कहावत चरितार्थ हुई गई कि ससुर  कुत्ते की पूंछ को दस बरस भोंगली मा रखा अऊर बाहर निकाला त टेढी की टेढी…..खुशदीप बचुआ का ब्लाग हम पढता रहता हुं …..बहुते सार्थक अऊर अच्छा लिखते हैं…पर उहां पर ई मगरुरवा ने अपनी औकात दिखा दी।    पहले उहां

हर ब्लॉग कुछ कहता है...खुशदीप  पर कुछ ठो टिप्पणीयां देखी जाये फ़िर हम अपनी बात कहेंगे।

 

मियां जी..जरा सुनो! said...

@ खुशदीप
पिछले कुछ दिनों से यह देखने मे आरहा है कि तुम आत्ममुग्ध हुये जारहे हो। जो कि तुम्हारे जैसे उदयीमान ब्लागर के लिये अच्छा नही है। मेरी इस टिप्पणी से तुमको बुरा भी लगेगा और झटका भी लगेगा. फ़िर भी हम तो सच बोलने की वजह से ही बुरे बने हैं आज तक। हमको कोई फ़र्क नही पडता। अब तो यहां ये सब आत्ममुग्धता देखते हुये ५ वर्ष से ज्यादा का समय हो चुका है। यहां सब बरसाती नदी नालों जैसे आये और चले गये।


अब असली बात
तुम पिछले कुछ दिनों से रोज इस बात पर खुद की पीठ ठोक रहे हो और तुम्हारे यहां आने वाले लोग ठॊक भी जाते हैं कि ब्लागवुड शब्द तुमने इजाद किया है. जबकि कुछ पुराने ब्लागर भी तुमको इस बात पर दाद दिये जारहे हैं जबकि वो जानते हैं कि यह सही नही है. मतलब तुमको चढा रहे हैं चने के झाड पर। इन्होनें कईयों को चढाया और उतारा है अब लगता है नंबर तुम्हारा है।


इस संबंध मे मुझे दो बाते कहनी हैं और जो पुराने या तथाकथित वरिष्ठ या गरिष्ठ ब्लागर जिनकी यहां टिप्पणीयां मौजूद हैं वो भी सुन लें।


१. यह कि तुम्हारा शब्द ब्लागवुड गलत है| असली शब्द होगा "ब्लागीवुड"जैसे की मुंबई का बालीवुड, अमेरिका का हालीवुड, कोलकाता का टालीवुड और पाकिस्तान (लाहोर) के लिये लालीवुड होता है| जरा सोचो..अगर बालीवुड को बालवुड, हालीवुड को हाल्वुड, टालीवुड को टालवुड और लालीवुड को लालवुड कहा जाये, तो कैसा लगेगा? ऐसा ही तुम्हारा ब्लागवुड शब्द लगता है. अत: यह शब्द ब्लागवुड नही बल्कि ब्लागीवुड होगा।

२. अब तुमको असली झटका लगेगा । ब्लागीवुड शब्द का इस्तेमाल शायद सबसे पहले कुश जी ने किया था| अत: इस शब्द का जनक वो ही है आप नही। और यह बात यहां जितने भी गरिष्ठ ब्लागर हैं उन्हें अच्छी तरह पता है।


और अगर तुमको या तुम्हारे समर्थकों को मेरी बात गलत लग रही हो तो जरा गूगल सर्च मे ब्लागीवुड शब्द हिंदी मे डालकर सर्च करना। तुमको पता चल जायेगा कि यह शब्द तुम्हारे ब्लाग लेखन में पैदा होने के बहुत वर्षों पहले से इस्तेमाल होता आरहा है।


वैसे हम आजकल कुछ बोलते नही है। क्युंकि आजकल सब चमचागिरी का राज चल रहा है। पर रोज रोज तुम जैसे लोगों का यह आत्मप्रचार सहन नही होता इसलिये असली बात कहे बिना रहा भी नही गया।


सच्ची बात कहने मे मिर्ची लगती ही है, तो लगे हमारी बला से।

January 23, 2010 10:53 AM

 

अब देखे वाली बात ये है कि ये ससुर  मियांजी कौन हैं?  नाही पहचाने का? त अब पहले कछु टिप्पणी अऊर देखा जाई…

 

[meenakumari.jpg]

'अदा' said...

@ मियाँ जी...जरा सुनो...
वैसे तो जो कुछ आपने खुशदीप जी से कहा है उसका जवाब वही देंगे....की वो कितने आत्ममुग्ध है या कितने बरसाती नदी है...


मैं इस लिए जवाब देने आई हूँ...क्यूंकि मैंने भी 'ब्लागवुड' शब्द को पसंद किया था....मुझे तो वैसे भी ५ महीने ही हुए हैं ब्लॉग्गिंग करते हुए इसलिए ना तो मैं गरिष्ठ हूँ ना वरिष्ठ ना ही विशिष्ठ...फिर भी मुझे' ब्लागवुड' शब्द 'ब्लागीवुड' से ज्यादा पसंद आया..हालांकि इसकी व्युत्पत्ति के बारे में मुझे अभी-अभी आपसे ही पता चला...खुशदीप जी के शब्द हो पढ़ते साथ अपने आप ही मन में 'ब्लागीवुड' आ गया था...क्यूंकि..बॉलीवुड , लालीवुड, hollywood इनसब की जानकारी हमें भी है...और सभी नाम hollywood की तर्ज़ पर बने है....कॉपी ही है...कौन सी ओरिगिनल बात है इसमें....कम से कम ब्लागवुड तो ओरिगिनल है....


अपनी अपनी पसंद है ..


आप कहते हैं की आप ५ साल से ब्लॉग्गिंग कर रहे हैं फिर भी आपके प्रोफाइल में कुछ नज़र नहीं आया....और इतने वरिष्ठ, गरिष्ठ विशिष्ठ होते हुए भी आपको यह बात छुप कर कहनी पड़ी..
हैरान हूँ...!!

January 23, 2010 12:12 PM

अब एकरा बाद मा फ़िर मियां जी आये अऊर कहन लगे….

 

मियां जी..जरा सुनो! said...

@ अदा जी, समस्त वरिष्ठ एवम गरिष्ठ ब्लागर गण,
हमने तो पहले ही रहा था कि सही बात पर सबको मिर्ची लगेगी। सो तुरंते लग गई। आप लोग जो सही बात है उसको स्वीकारने की बजाये उल्टा हमें ही आंखे दिखा रहे हैं? ई त कोनू सही बात नाही बा।


और मिर्ची तो सही बात पर ही लगती है सो लग गई। अब हमे कुच्छौ नाही कहना है, जो हकीकत है वो है। अब आप नया नया लोग हैं तो आपसे क्या कहें? आप तो समझते हैं कि दुनियां वही है जेतना आपको दिखाई पडता है तो क्या दुनिया एतना छोटा होजायेगा?
हम तो एके बात कहुंगा कि ब्लाग्वुड गलत शब्द है अऊर ई कोनू खुशदीप का इजाद नाही बा।

January 23, 2010 12:37 PM

अब ईका बाद मा महफ़ूज बचुआ ने भी काफ़ी कछु बुरा भला मियां जी को कहा….पर ससुर मियां जी ठहरे बेशर्म…फ़िर मुंहजोरी करते हुये आ धमके…अऊर उल्टे चोर को कोतवाल को डांटे ऊ हिसाब मां महफ़ूज अऊर खुशदीप बचुआ को आंखे दिखाने लगे…

 

मियां जी..जरा सुनो! said...

हम तो पहले ही कहे रहे कि सही बात पर मिर्ची लगेगी त लग गई..आप अऊर आपके चम्मच छुरीयां बाहर आगये। अब पोस्टवा लिख कर कौन सी बात सही कर लोगे? सत्य त सदा सत्य ही रहेगा मियां?


का महफ़ूज मियां? तुहार adrenalin hormone कछु जियादेई बढ गईल का?


अऊर हां खुशदीप मियां...पोस्टवा सिर्फ़ तुमको ही नाही सबको लिखनी आती है...समझे कि नाही?

January 23, 2010 1:26 PM

अऊर इत्ता सुनके तो महफ़ूज बचुआ  गुस्से से बिलबिला ऊठे अऊर एक ठो फ़िर गोली चलाया….

 

[clip_image003.jpeg]

महफूज़ अली said...

@ मियां जी..जरा सुनो!
बहुत बेशर्म इंसान हो.... अपनी पैदाइश आख़िर साबित कर ही दी ना? गलत नहीं कहा था... SON OF A VIRGIN MOTHER...


मियां जी... कुछ बोलने से पहले सोच लेना... IP Address पता कर के ...घर खोज लेना बहुत आसान काम है... घर खोज लिया तो रात में तीन बजे घर में घुस कर मारूंगा.... ब्लॉग पर तीन लोगों का IP address पता कर के लोगों को बताया हूँ.... यकीन ना हो तो जाकिर अली'रजनीश" और मिश्र जी से पूछ लो.... मैंने IP Address पता कर लिया तो बहुत मुश्किल में आ जाओगे.... तुमने अभी अदा जी और खुशदीप जी को उल्टा सीधा लिखा है... अब और बोलोगे... तो पछताने के अलावा कोई चारा नहीं होगा....


मैं वैसे भी ओल राउनडर हूँ.... तुम मेरा कुछ भी नहीं उखाड़ पाओगे... मिर्ची तो मैं ऐसी जगह तुम्हारे ठूसूंगा ... कि बुढौती/जवानी सब खराब हो जाएगी.... मुझे जानने वालों से पूछ लो...

January 23, 2010 1:49 PM

 

और भैया…इहां महफ़ूज बचुआ की तरकीब काम कर गई अऊर गुस्से मा कारा चश्मा अऊर टी शर्ट टांग कर  असली मियां जी यानि कि मगरुरवा आया अऊर उकी बात का समर्थन मां ना कछु रामराम..ना कछु श्याम श्याम किया अऊर लिंक टिका कर चलता बना…जरा देखा जाये…

 

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कुश said...

http://chitthacharcha.blogspot.com/2008/10/blog-post_2006.html

January 23, 2010 3:02 PM

 

अब इहां मियांजी की पोल त खुल ही चुकी थी. तब खुशदीप बचुआ ने लिखा कि….

 

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खुशदीप सहगल said...

@कुश जी,
आपने सिर्फ लिंक देकर छोड़ दिया...बाकी एक भी शब्द नहीं लिखा...मुझे याद पड़ता है तो आप पिछले पांच महीने में सिर्फ एक बार मेरी किसी पोस्ट में कमेंट करने आए थे...आज...मियां जी...ज़रा सुनो!!! के जन्म लेने के साथ आप फिर अचानक अवतरित हो गए...कहीं इस नवजात शिशु से आपका कोई संबंध तो
नहीं...
जय हिंद...

January 23, 2010 3:50 PM

 

अऊर इस बात मगरुरवा कुशवा भडक गया ई सोचकर कि अब पोल खुल चुकी है अऊर अपनी मगरुरी दिखाते हुये टीप मारा…

 

कुश said...

@खुशदीप जी
मैंने अपने कमेन्ट के ऊपर आपका कमेन्ट पढ़ा नहीं था.. अगर पढ़ लिया होता तो कमेन्ट ही नहीं करता.. गलती थी जो यहाँ पर कमेन्ट किया.. जो लोग कान बंद करके बैठते है उन्हें आप कुछ समझा नहीं सकते.. आपको आपका शब्द मुबारक..


और हाँ अपनी बात कहने के लिए मुझे बेनामी बनने की जरुरत भी नहीं.. गलती के लिए माफ़ी यहाँ दोबारा आ गया..

January 23, 2010 6:07 PM

 

अब हम कहता हूं आप सब लोगन से कि ई मगरुरवा का तमाशा त देखो कि कितनी मगरुरी दिखात है?  का रे मगरुरवा?  तुझको कौन बुलाने गया रहा?   तू खुद तेरी मर्जी से  मियांजी बनके आया….खुदे लिंक देके कहत  रहा कि ब्लागवुड तूने ही रचा है…कल को ई भी कहेगा कि ई ब्लागर भी तूने ही बनाया….मगरुरवा कछु त शर्म करो….तोहरे मा कौडी की अक्ल नाही अऊर नबाव बनने का सपने देखत हो?

 

इहां एक बात ध्यान देने वाली अऊर रही की सब जगह अपनी टांग घुसाने वाले शुकुल जी महराज अपना चेलवा के समर्थन मा आगे नाही आये?  का हुआ शुकुल जी महराज? का डोमेन का गम मे रहे का?

 

हां त अब ई तो रहा एक एपिसोड्वा अऊर दूसर एपिसोड रहा डोमेनवा का। अब हम का बतायें भाई?  हम बोलूंगा त सबको बुरा लगेगा. पर का कहें… अब आयें है त …बोलना तो पडेगा ही ना…त बोल रहे हैं…लोग सब मार तमाम पोस्टवा ठेले जा रहे हैं ..सब बडका…लोग भी …अब लिखने का कोनू सामान नाही दिखा त यही लिख डारे….

 

शुकुल जी महराज ने एक ठो चर्चा की रही "गणतंत्र ठिठुरते हुये हाथों की तालियों पर टिका है"  अऊर एक ठॊ पोस्ट भी लिखवा डाली।   शुकुल जी ने उहां बडा नेक दिली दिखाते हुये फ़रमाया…

 

हमेशा की तरह आगे भी चिट्ठाचर्चा से जुड़े किसी भी मसले पर कोई भी निर्णय साथी चर्चाकारों की आमसहमति से ही होगा। लेकिन इस चिट्ठाचर्चा.कॉम नाम से जुड़ा कोई भी नैतिक/सामाजिक अधिकार का रोना हम नहीं रोयेंगे। कानूनी/व्यवसायिक अधिकार तो बनते ही नहीं। चिट्ठाचर्चा.कॉम जिसके नाम से लिया गया वह हमसे बाद की पीढ़ी का है। अपने से छोटों की उन्नति की किसी भी राह में रोड़ा बनकर हम अपनी नजर में छोटे नहीं होना चाहेंगे।

 

त शुकुल जी हम ई पूछना चाह रहा हूं कि जब आपको कोनू तकलीफ़ ही नाही है त काहे अपने वरिष्ठ अऊर गरिष्ठ लोगन से पोस्टवा लिखाय कर माहोल बिगाड  रहे हैं? आप ई समज

लिजिये कि इहां का माहोल खराब करने मे आप एक नम्बर के जिम्मेदार हैं अऊर आपके ई चेले चमचे दूसर नम्बर पर….

 

अऊर बच्चा लोगो ई भी देखा जाये कि शुकुल जी महराज शरीफ़ बन रहे हैं अऊर एक  ब्लागर इहां इसी पोस्टवा पर टिपटिपा कर  सरे आम डोमेन बुक करवाने वालों को चोर ऊठाईगिरे और दोयम दर्जे का बता रहे हैं … अऊर  शुकुल जी  को बडका एक नंबर का शरीफ़….अब ई त आप लोगों को ही तय करना पडॆगा कि कौन शरीफ़ अऊर कौन चोर?

 

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ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey ने कहा…

वाह, चिठ्ठाचर्चा का नाम हडपने की होड़ है! नाम हड़पने का काम तो दोयम दर्जे के लोग किया करते हैं। प्रथम दर्जे के लोग तो खुद ब्राण्ड बनाते हैं।


खैर, जमाना शायद चरित्र का नहीं, व्यक्तित्व का है!

January 27, 2010 3:56 PM

तो हम पूछा चाहते हैं  ज्ञानदत्त पांडेय से..

१. आप कौन सी होड की बात करते हैं? आपने कितने नाम बुक करवाये? या आप ई कहना चाहते हैं कि ई डोमेनवा किसी ने शुकुल जी की आंख मे मिर्ची झौंक कर लूट लिया क्या?

 

२. आप कहते हैं कि हडपने का काम तो दोयम दर्जे के लोग किया करते हैं….त ई बताईये कि आप उन लोगों को दोयम कहना चाह रहे हैं जिन्होने यह डोमेन रजिस्टर्ड करवाया? क्या आप जानते हैं कि आप सीधे सीधे गाली दे रहे हैं? अऊर ई भी जानत होंगे कि डोमेन हडपा नही जाता बल्कि उपलब्धता पर मिलता है. काहे आप लोगों को गुमराह कर रहे हैं?

 

३. आपका फ़रमाना है कि प्रथम दर्जे के लोग तो ब्रांड बनाते हैं.  तो आप क्या ई कहना चाह रहे हैं कि शुकुलजी अऊर मगरुरवा ने लोगों की इज्जत खराब करके ..उनकी मौज लेके ये ब्रांड बनाया है?  अऊर क्या इस ब्रांड की यही औकात है कि ये सडक पर पडा हुआ मिल रहा है? जरा किसी ब्रांड को आप खरीद कर तो बताईये.  जो डोमेन लिया गया है उसकी औकात ये है कि जैसे सडक पर पडा हुआ मिल रहा हो. अब भी उस से संबंधित ब्रांड तमाम सडक पर बिखरे माल जैसा उपलब्ध है।

 

हम कहता हूं कि जब एतना ही ब्रांडेड माल रहा त क्युं नाही संभाल कर रखा?  क्या आप अपना तिजोरी को सडक पर खुला छोड देंगे  अऊर ई उम्मीद करेंगे कि दूसरा  नेक नियती अऊर पुरातन के नाम पर कोई उसको उठायेगा नही?

 

आप सीधे सीधे गाली देरहे हैं….अऊर ई भी समझ लिजिये कि आदमी को सब बात समझ कर कोनू बात कहे का चाही…ई नाही कि शुकुल जी महराज रो दिये आपका पास आकर अऊर आप तुरंते आकर बंदूक मार दिये…सब इज्जतदार लोगों को चोर-अऊर दोयम कहके…ई सब आपको शोभा नाही देत बा…….लोगों को गाली देना बंद किजिये…और शुकुल जी को कहिये कि अगर सामान एतना ही कीमती है त संभाल कर रखें…अऊर बेफ़ालतू का रोना गाना बंद करें……

 

त बच्चा लोग अब आज का टिप टिप खत्म   …अऊर हम जल्दी ही फ़िर आऊंगा….

 

शुकुल जी महराज…हमरे खिलाफ़ कुशवा  वाली टिप्पणी हटाई जाये…वर्ना हमरा सत्याग्रह जारी रहेगा…अब अऊर तेज मुहीम करुंगा.

,

उम्र बढ़ती गई अनुभवों के ख्बाव सजते रहे :चच्चा टिप्पू सिंह

[ 12/15/2009 | 20 comments ]

बच्चा लोग ..कैसन हैं आप लोग? आज हम आपको थोडी सी यानि कि मुठ्ठी भर टिप टिप करके ई टिप्पणी चर्चा सुनवा रहे हैं…तो सुनो अऊर बताय्व कि कैसन लगी ई चर्चा.

पहेली का निष्कर्ष : स्त्री/पुरुष विमर्श

 

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Arvind Mishra ने कहा…

उदासी मिटाना,
और सबको हँसाना
निवेदन मैं सबसे किये जा रहा हूँ...
अरे अरे छटंकी सी कविता और भाव में टंकी का इशारा ,रुकिए जरा मेरा जवाब भी तो लेते जाईये !
मैं ४ लेकर तीन उसे दे दूंगा और वह उसमें से भी १ मुझे दे देगी ! मेरी पत्नी और प्रेयसी दोनों क्षीण काया है न !

12/14/2009 03:27:00 अपराह्न
 

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सुनीता शानू ने कहा…

समीर भाई मै तो पतिदेव को ही पहले खिलाती हूँ, और वो कभी-कभी तो अपनी धुन में सारा खा जायेंगे, या कभी मालूम हुआ की इतना ही बचा है तो अपना हिस्सा भी मुझे हिदायत देते हुए खिला देंगे कि ढँग से खाया करो, या बाँट कर भी खा सकते हैं...
और सुनाईये कैसे हैं आप?

12/14/2009 07:32:00 अपराह्न

 

तृप्ति तभी ही संभव है.!!!!

 

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जी.के. अवधिया ने कहा…

"बाधाएं जीवन की
खड़ी हैं निरंतर
सामने
अवरोधक बनकर
जिन्हें एक पार करना है
एक कुशल धावक की तरह
पहुंचना है विजय रेखा तक
तृप्ति
तभी ही संभव है."

अति सुन्दर!

१४ दिसम्बर २००९ ८:३३ AM

 

मां अदा चैतन्य कीर्ति महाराज साहिबा जी आश्रम के महिला प्रभाग की महा-प्रबंधक घोषित

 

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वाणी गीत said...

माँ अदा चैतन्य कीर्ति जी ,
आश्रम में पदवी पाक अपनी इस शिष्या को मत भूल जाईयेगा ...
बस आपकी कृपा दृष्टि बनी रहे ....जीवन सफल हुआ ही मानो ...!!

December 13, 2009 9:19 PM

 

नाचिये, थाप जब उठे दिल से

 

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RAJ SINH said...

क्या बात है नीरज भाई ,
गुरु पंकज की दरख्वास्त पर ,एकाध शेर का तड़का भाभीजी के नाम का तो होना ही चाहिए था . खैर तिलकराज जी ने वह कमी तो कुछ पूरी की ( फीस मिलनी चाहिए उन्हें )
मेरी तरफ से कुछ ''''''''''''''''
तुम तो नीरज फुहार क्या बनते
बात भाभी में है ज़माने की
आप दोनों की जोड़ी हंसती मुस्कराती सदा सलामत रहे . मिष्टी बिटिया को स्नेह

December 15, 2009 3:16 AM

 

अफ़ज़ल गुरु की फ़ांसी का मज़ाक और २००१ के हमले का आंखो देखा हाल.

 

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अल्पना वर्मा said...

इस घटना के आप चश्मदीद गवाह रहे इसीलिए यह आप के मानस पटल पर हमेशा अंकित रहेगी.
कल इस घटना में शहीद हुए जवानो को श्रद्धनजली देने के लिए सांसदो का ना पहुँचना बेहद दुखद और शर्मनाक था.कैसे इतनी आसानी से
शहीदों को सांसदो ने भुला दिया?सिर्फ़ गिनती के ही नेता वहाँ पहुँचे थे.
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--अफ़ज़ल गुरु को फाँसी नहीं दी गयी तो यह उन शहीदों का अपमान होगा और न्याय का मखोल.
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December 13, 2009 9:22 PM

 

कुंडली देखकर किसी व्‍यक्ति के विभिन्‍न पहलुओं की स्थिति या भविष्‍य का अनुमान हम कैसे लगाते हैं ??

 

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दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

भाव तो समझ आए। एक के बाद एक आते हैं क्रमानुसार। पर यह कभी समझ नहीं आया कि पहले भाव से शारीरिक स्थिति ही क्यों देखी जाती है? उस से आर्थिक या पारिवारिक स्थिति क्यों नहीं देखी जाती। किसी भी भाव से किसी खास स्थिति को देखने का आधार क्या है। किसी ने यूँ ही निर्धारित कर दिया और फिर सब भेड़ चाल की तरह उस के पीछे चल पड़े या उस का कोई ठोस आधार है?
एक सवाल और मेष राशि का स्वामी मंगल ही क्यों है. वृष का शुक्र ही क्यों और मिथुन का बुध ही क्यों कर्क का चंद्रमा और सिंह का सूर्य क्यों? यह किसने निर्धारित किया? और इस का आधार क्या है?

१४ दिसम्बर २००९ ८:१४ PM

 

तेहिं तर ठाढ़ि हिरनियाँ ....

 

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Meenu Khare says:
December 15, 2009 9:08 PM

बहुत अच्छी पोस्ट लिखी है हिमांशु जी. यह सोहर पहली बार आकाशवाणी बीकानेर से अपने रेडियो प्रसारण के दौरान मैने गाया था और जैसे ही गाया आँखें भर आई. हिरनी के दुख को लोकभाषा में ऐसे मढ़ा गया है कि हर हृदय का डफ़ बज उठता है.इस मार्मिक पोस्ट के लिए बधाई.

 

शर्मशार है लोकतंत्र !

 

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संजय बेंगाणी said...

पहले तो यह बताओ सस्ता जहर मिल कहाँ गया जो रोटी की जगह आदमी ने खा लिया? भूखों मरने की नौबत आ गई है.
पता नहीं मशीन कहाँ से वोट उगलती है? :(

December 14, 2009 12:05 AM

 

ममता जी irctc पर ध्यान दें

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संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari ने कहा…

समाचार पत्रों व टीवी आदि में इस संबंध में समाचार प्रकाशित होनें चाहिए सीधे रेल मंत्री से उन्‍हें सवाल भी पूछनी चाहिए. हम और आप जो कर सकते हैं वह यही है. विरोध के स्‍वरों को जीवंत रखना.

१४ दिसम्बर २००९ ९:५१ PM

ब्रेड बँटवारा और स्त्री /पुरुष विमर्श.......घुघूती बासूती

 

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डा० अमर कुमार ने कहा…


मेरे यहाँ रखा हुआ बॅन अब तक अपनी ताज़गी खो चुका है ।
निरा भुरभुरा हो रैया है, यह तो !
मुझसे बॅन का चूरा तो नहीं खाया जायेगा ।
अब क्या किया जाये,
कोई और गणित ?

1:25 अपराह्न

 

ऍम शो मिष्टी महफ़िल/ जिसमे आप अपनी रचना भेज सकते है !!!

 

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पी.सी.गोदियाल said...

मुरारी भाई , मैंने तो उस दिन आपकी उस सूचना को सच में एक मजाक समझ लिया था ! आगे से सीरिअसली लूंगा !

14 December 2009 12:06 AM

 

हर हाकिम, शैतान हो गया...

 

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पं.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

भई मौदगिल जी, आज तो रचना की तारीफ वास्तै शब्द की कोणी मिल रहे.....
एकदम जोरदार्!!!

15/12/09 17:16

साप्ताहिक संन्यास,बाबा झाउआनन्द,और बोध कथा

 

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ललित शर्मा ने कहा…

आप न काहु काम के डार पात फ़ल फ़ूल, औरन को रोकत फ़िरे रहिमन पेड़ बबूल ई संसार है कभी-कभी क्षणिक श्मशान बैराग भी हो जाता है। ई कांटा फ़ूल का दोस्ती ही अईसा है भैया। आभार

१५ दिसम्बर २००९ ५:०८ PM
 

मेरी इन आँखों में बसे सारे ख्बाब तुम ले जाओ

 

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निर्मला कपिला ने कहा…

मेरी दुनिया में तुमको लौट कर आना ही नहीं है
सारे ख़त लौटा दो आकर अपने जबाब ले जाओ.
बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति है शुभकामनायें

15/12/09 09:27

उम्र की सांझ का, बीहड़ अकेलापन

 

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महफूज़ अली said...

वृद्धों की यह पीड़ा मैं समझ सकता हूँ..... आपने इनकी पीड़ा को बहुत मार्मिकता से दिखाया है...... और आपकी यह कविता दिल को छू गई..... यह देख कर बहुत अच्छा लगा कि आपने कविता लिखी...... पहली बार कविता लिखने के लिए बहुत बहुत बधाई.....

14/12/09 8:04 AM

चलता फिरता मोबाइल डी. जे. ( संगीत यंत्र )

 

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शरद कोकास said... on 
December 15, 2009 4:37 PM

जाने कितने बैंड्बाजे वालों के पेट पर लात मारी है इस डी जे ने और विवाहस्थल पर इसके चलते तो आपस मे बात तक नही कर पाते है.. सिर्फ शोर ..संगीत नदारद ।

 

रात इतनी भी नहीं है सियाह

 

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खुशदीप सहगल15 December 2009 11:57 AM

द्विवेदी सर,
कितना अच्छा हो ब्लॉगिंग को लोकाचारी बनाने के लिए सभी ब्लॉगर इस कविता को आत्मसात कर लें...एक-दूसरे की टांग खिंचाई बंद कर टीम की तरह आगे बढ़ें...
जय हिंद...

DDLJ के जादू का बाकी है असर

 

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अभिषेक ओझा said...

मेरे एक मित्र हैं उन्होंने हॉस्टल में मेरे डब्बे पर करीब मेरे ५०० बार चलाई होगी ये फिल्म :)

December 15, 2009 4:07 PM

 

 

लीजिये हाजिर है : हिन्दी में LinkWithin टाइटल (रिलेटेड पोस्ट विजेट) जी हाँ हिंदी में !

 

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Ashok Pandey said:

बहुत अच्‍छी जानकारी। हमारे खेती-बाड़ी ब्‍लॉग में यह विजेट हमेशा एक ही पोस्‍ट दिखाता है...उसके लिए भी कोई समाधान होगा तो जरूर बताइएगा।

 

 

 

चले जैसे हवाएं सनन सनन ....तो फ़िर रिमझिम क्यूँ न गिरे सावन.....

 

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Mithilesh dubey said...

क्या बात है क्या बात है , भाई अब बहुत जलन हो रही है सभी कलाकार एक ही घर में हाँ , ये तो नाईसांफी है । आवाज के तो क्या कहने बहुत खूब , अभी ज्यादा नहीं कहूँगा बाद आता हूँ, फीर बात होती है ।

December 14, 2009 8:28 PM

 

सीरियल ब्लास्ट का दूसरा धमाका पाबला जी के नाम

 

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राजीव तनेजा ने कहा…

गुड!..इसे कहते हैँ...सधे हाथों द्वारा किया जाने वाला नियंत्रित डिमालीशन(ब्लॉगजगत की कमियों का)

१५ दिसम्बर २००९ ९:०७ AM

 

 

स्वामी ललितानंद महाराज प्रवचनमाला भाग - 3- शब्दै मारा गिर पड़ा

 

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खुशदीप सहगल said...

बाबा जी,
कड़की ज़्यादा हो गई है, सोच रहा हूं आपका अपने शहर में एक कथा-वाचन कार्यक्रम करा के दो-चार पैसे ही कमा लूं...घोड़ा, तमंचा, रामपुरी सब तैयार रखूंगा...ज़रा किसी ने शुभ काम में टंगड़ी अड़ाने की कोशिश की नहीं कि वहीं
कलटी कर देंगे...
जय हिंद...

December 14, 2009 10:32 PM

 

कांटा लगा, हाय लगा...खुशदीप

 

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'अदा' said...

सही पूछो तो सरकार के पास कीमतों के बारे में जो भी जानकारी आती है वो थोक बाज़ार या होलसेल इंडेक्स पर ही टिकी होती है...यानि रीटेल कीमतों की सही स्थिति जानने के लिए सरकार के पास सिस्टम ही नहीं है...और आपका-हमारा थोक से नहीं सिर्फ रीटेल कीमतों से ही वास्ता होता है...इस थोक और रीटेल के बीच ही महंगाई की सारी जड़ छुपी हुई है...
खुशदीप जी,
आपने सही नब्ज़ पकड़ी है.....देश के नेताओं को बात ही समझ में नहीं आती....और आये भी कैसे एक तो गोरी ऊपर से वेट्रेस ...दीमाग तो होता ही नहीं है....
और बाकि कसर उनके रिश्तेदार पूरी कर दे रही हैं...बहुराष्ट्रीय कंपनियों ....मतलब की एक करेला ऊपर से नीम चढ़ा....
हमेशा की तरह..जबरदस्त लिखा है जनाब आपने....अब तो तारीफ करने के लिए भी शब्द ढूंढना पड़ता है ...कभी कभी थोडा कम अच्छा भी तो लिखा कीजिये न हुजुर.....हा हा हा

December 15, 2009 8:52 AM

 

ऐसी की तैसी उन सबकी ....ये नया नया जोश है अभी!

 

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हिमांशु । Himanshu said...

अदभुत ! मैं तो आपके इन किस्सों में आनन्द इसलिये पाता हूँ कि इनको प्रस्तुत करने का अंदाज विलक्षण है । बहुत कुछ सीखा जा सकता है इस प्रस्तुति के अंदाज से । हास्य-बोध का तो कहना ही क्या !
हाँ, इस तरह अ-निमंत्रित भोजनादि के कार्यक्रमों में हिस्सा लेना गेट-क्रैश कहलाता है, यह भी नहीं जानता था । कभी किया नहीं न ! -शायद इसीलिये ।

14 December 2009 20:09

कार्टून:- रसोई में कार्टून

 

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पी.सी.गोदियालDecember 15, 2009 9:53 AM

हा-हा , ऊपर से पांच-सात सौ रूपये सिलेंडर पर भी खर्च कर डाले, इसे कहते है कंगाली में आटा गीला !

 

 

 

 

ताऊ पहेली - 52 :विजेता श्री काजलकुमार

 

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मीत

Monday, December 14, 2009 11:50:00 AM

सलाम है ऐसे योद्धा को...
सच तो ये है की ऐसे योद्धाओ की क़ुरबानी आज बेकार होती जा रही है, यह देश आज आज़ाद होते हुए भी गुलाम सा लगता है...
मीत

क्षणिकाएँ...

 

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Udan Tashtari said...

उफ्फ!! बड़ी कातिल हैं यें क्षणिकायें तो..ऐसे गजब भाव!!
पर न जगाना
उन उलझनों को
जिनको थपथपा
के मैंने सुलाया है अभी !
क्या बात है..हमें तो हमारे विल्स कार्ड याद हो आये...बहुत सुन्दर. और लाईये!!!

7:54 PM

भारतीय संस्कृ्ति का महान प्रतीक चिन्ह-----स्वस्तिक(a symbol of life and preservation )

 

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प्रवीण शाह 15 December 2009 9:38 PM
.
आदरणीय पंडित 'वत्स' जी,
आप भी नई नई चीजें खोज लाते हैं।
एक नया शब्द 'बोविस' आपके आलेख में पढ़ा, जानने की जिज्ञासा हुई कि यह है क्या चीज...
सबसे पहले तोयहां पर देखिये कितना 'बोविस' है कहां पर...
"जानिए की किस चिन्ह में कितनी ऊर्जा समाई है।
भारतीय स्वस्तिक - 1,00,0000 बोविस। यदि इसे उल्टा बना दिया जाए तो यह प्रतिकूल ऊर्जा को इसी अनुपात में बढ़ाता है।इसी स्वस्तिक को थोड़ा टेड़ा बना देने पर इसकी ऊर्जा मात्र 1,000 बोविस रह जाती है। ऊँ के ऊर्जा क्षेत्र में 70,000 बोविस की ऊर्जा होती है। वहीं चर्च के क्रास में 11,000 बोविस ऊर्जा होती है। चर्च में बजने वाली घंटियों में भी 11,000 बोविस की ऊर्जा होती है।
मस्जिद में औसतन 12,000 बोविस की ऊर्जा होती है। तिब्बत के मंदिरों में ऊर्जा का स्तर 14,000 बोविस रहता है। बुद्ध के स्तूप में 12,000 बोविस ऊर्जा मापी गई है। तिब्बत वासियों की पूजा के समय घुमाया जाने वाला चक्र 12,000 से 14,000 बोविस ऊर्जा का निर्माण करता है।
इजिप्ट में ‘आई’ सिंबल प्रतीक चिंह में 9,000 बोविस ऊर्जा बताई जाती है। रूस में पवित्र माने जाने वाले ‘की’ (चाबी) के चिंह में भी 9,000 बोविस ऊर्जा है। इसी तरह लाल रंग के फूलों में ऊर्जा की मात्रा 65,00 से 72,00 बोविस ऊर्जा है।"

मेरी दिल्ली यात्रा – 2

 

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अजय कुमार झाDecember 15, 2009 1:25 PM

हमारी दिल्ली में आए वो मेहमान बनके ,
न मिले निकल गए , अनजान बनके ॥
बहुत नाइंसाफ़ी है जी ....हम बहुत नाराज हैं आपसे जाईये कुट्टी ....नहीं नहीं .....अबके तो कुट्टा करना पडेगा ....चलिए आप खूब घूमी फ़िरी ..हमे इसी बात की खुशी है

 

आदि के साथ रविवार.

 

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Udan Tashtari said...

अरे यार आदि....ये क्या कर रहे हो...पापा को पसीने न छूटें इस ठंड में तो क्या फायदा तुम्हारी बदमाशी का...ऐसी हालत कर डालो कि तुम्हारे बदले पापा चिल्लायें...मम्मी..मम्मी!!! :)

December 15, 2009 6:40 PM

 

खुल्ला खेल फ़र्रुखाबादी (144) : आयोजक उडनतश्तरी

 

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श्री श्री १००८ बाबा समीरानन्द जी said...

जय हो.
भक्तों को बाबा का बहुत आशीष.
बाबा के आश्रम पधार कर आशीर्वाद ले लो...
नोट:
. पहेली में भी जीतने के लिए आश्रम में हवन करवाया जाता है.
. हमारी कोई ब्रान्च नहीं है.
. नकलचियों से सावधान.
. ब्लॉगजगत के एकमात्र सर्टीफाईड एवं रिक्गनाईज्ड बाबा.
-सबका कल्याण हो!!
सूचना:
-बाबा प्रॉडक्टस के लिए आश्रम पधारें-
कुंभ की विशेष छूट
बेहद सस्ते दामों पर
महा सेल-महा सेल-महा सेल
नोट:
ऐसा मौका फिर १२ साल बाद आयेगा.

15 December 2009 18:18

फिर हम तुम्हारे किसलिए ?

 

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डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

बेचैन होकर रह गई दिल की उमंगें,
खफा हो गई अब रातों की नींद है,
सोचकर बताना हमें, हमने लगाए
अँधेरे गले, तजकर उजारे किसलिए ?
बहुत बढ़िया!
महफूज अली ने दो लोगों को
फोन करके बुलाया तो था!
हुलिया बिगड़ गया दोनों महाशय जी का!

December 15, 2009 6:00 AM

 

इश्क चढ़ता गया

 

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महेन्द्र मिश्र said...

उम्र बढ़ती गयी इश्क चढ़ता गया
ख्वाब सजते रहे दिन गुजरता गया
बहुत सुन्दर
उम्र गुजरती गई पड़ाव दर पड़ाव आते रहे
उम्र बढ़ती गई अनुभवों के ख्बाव सजते रहे

December 15, 2009 7:28 AM

 

हां त बच्चा लोग अब चच्चा की टिप टिप ले ल्यो..एक बात अऊर आप लोगन से कहना चाह रहे हैं कि एक ठॊ बात आप लोग जरुर ध्यान रखिये कि जैसन कुत्तव्वा का पूछंडी कभी भी सीधा नाही हुई सकत है उसी तरह कुछ मनई भी ऐसन ही होत हैं..सारी उम्र सीख पढके भी ढोर के ढोर रहत हैं। ऊ लोगों का का बात करने? छोडो  ऊ सब बातों को..अऊर आप लोगो को जो भी टिप्पणि वगैरह का खबर देने का रहे ऊ सब हमेशा की तरह चच्चा को मेल करते रहना। अऊर हमार आईटम डांसरवा  गुरु-चेलवा विडीयो मुख्य पेज पर जाकर जरुर देखना । अऊर बताना कैसन लगा? तो अब टिप टिप…जल्दी ई हम  फ़िर मिलुंगा।